राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत को दी जा रही Z plus Security को लेकर दाखिल जनहित याचिका (PIL) पर बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
याचिका में करदाताओं के पैसे से सुरक्षा पर हो रहे खर्च को चुनौती दी गई थी, लेकिन अदालत ने इसे खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता की मंशा पर भी सवाल उठाए। इस फैसले के बाद Mohan Bhagwat Security एक बार फिर चर्चा में आ गया है।
कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका
नागपुर निवासी ललन सिंह द्वारा दायर इस याचिका में कहा गया था कि एक “गैर-पंजीकृत” संगठन से जुड़े व्यक्ति को सरकार द्वारा दी जा रही हाई-लेवल सुरक्षा का खर्च सार्वजनिक धन से नहीं उठाया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता की ओर से यह मांग भी रखी गई थी कि सुरक्षा का पूरा खर्च संबंधित संगठन या व्यक्ति से वसूला जाए।
हालांकि, मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति भूषण गवई और जस्टिस अनिल किलोर की पीठ ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए यह संकेत दिया कि इसमें पर्याप्त कानूनी आधार नहीं है। साथ ही, याचिकाकर्ता के इरादे पर भी संदेह व्यक्त किया गया।
याचिका में उठाए गए प्रमुख तर्क
याचिका में यह तर्क दिया गया कि करदाताओं के पैसे का उपयोग एक ऐसे व्यक्ति की सुरक्षा पर किया जा रहा है, जिसका संगठन पंजीकृत नहीं है। इसके आधार पर इसे सार्वजनिक धन का दुरुपयोग बताया गया।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि यदि सरकार सुरक्षा उपलब्ध कराती है, तो उसके खर्च की भरपाई संबंधित व्यक्ति या संस्था द्वारा की जानी चाहिए। हालांकि, अदालत ने इन तर्कों को पर्याप्त नहीं माना।
40–45 लाख रुपये प्रति माह खर्च का दावा
याचिका में यह दावा किया गया था कि मोहन भागवत की Z plus Security पर हर महीने लगभग 40 से 45 लाख रुपये खर्च होते हैं। इसे राज्य के खजाने पर अनावश्यक बोझ बताया गया।
हालांकि, यह आंकड़ा याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत किया गया था और अदालत ने इस पर स्वतंत्र रूप से कोई पुष्टि या टिप्पणी नहीं की। इसलिए इसे आधिकारिक आंकड़ा नहीं माना जा सकता।
मुकेश अंबानी केस का हवाला
याचिकाकर्ता ने 2023 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला दिया, जिसमें उद्योगपति मुकेश अंबानी को दी गई Z plus Security का खर्च उनके परिवार द्वारा उठाने की बात कही गई थी।
लेकिन अदालत ने इस तुलना को स्वीकार नहीं किया। सुरक्षा से जुड़े फैसले प्रत्येक मामले की परिस्थितियों और खतरे के स्तर के आधार पर लिए जाते हैं। इस वजह से एक मामले को दूसरे पर लागू करना उचित नहीं माना गया।
मोहन भागवत को कब मिली Z Plus Security
मोहन भागवत को पहली बार 2012 में Z Plus Security प्रदान की गई थी, जब केंद्र में UPA सरकार थी। उस समय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे थे।
इसके बाद 2015 में उनकी सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया गया और इसकी जिम्मेदारी CISF को सौंपी गई। इससे पहले महाराष्ट्र पुलिस उनकी सुरक्षा संभाल रही थी। यह बदलाव सुरक्षा एजेंसियों के आकलन के आधार पर किया गया था।
What is Z plus Security: जेड प्लस सिक्योरिटी क्या होती है
What is Z plus Security एक महत्वपूर्ण सवाल है। भारत में Z Plus Security सबसे उच्च सुरक्षा श्रेणियों में से एक मानी जाती है। इसमें आमतौर पर 50 से अधिक सुरक्षाकर्मी तैनात होते हैं, जिनमें NSG कमांडो और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के प्रशिक्षित जवान शामिल होते हैं।
यह सुरक्षा उन व्यक्तियों को दी जाती है जिन पर उच्च स्तर का खतरा होता है। इसका निर्णय पूरी तरह खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट और जोखिम मूल्यांकन के आधार पर किया जाता है।
फैसले का व्यापक असर
बॉम्बे हाई कोर्ट का यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि जनहित याचिका दायर करने के लिए ठोस तथ्यों और मजबूत कानूनी आधार की आवश्यकता होती है। केवल अनुमान या तुलना के आधार पर ऐसे संवेदनशील मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
साथ ही, यह निर्णय यह भी दर्शाता है कि सुरक्षा से जुड़े मामलों में अदालतें सावधानी बरतती हैं और विशेषज्ञ एजेंसियों के आकलन को प्राथमिकता देती हैं।









