भागलपुर,देवरिया 
डेंजर ज़ोन में खनन पूरी तरह प्रतिबंधित होने के बावजूद भागलपुर क्षेत्र में खुलेआम मिट्टी और बालू की निकासी जारी है। यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है।

 मुद्दे की जड़

स्थानीय रिपोर्ट्स के अनुसार, जिन क्षेत्रों को “डेंजर ज़ोन” घोषित किया गया है, वहां खनन पर सख्त रोक है। इसके बावजूद भारी मशीनों के जरिए लगातार खनन कार्य चल रहा है, जो सीधे-सीधे नियमों की अनदेखी है।

करोड़ों का खेल

सूत्रों का दावा है कि रॉयल्टी और परमिशन की आड़ में करोड़ों रुपये के गड़बड़ी की आशंका है। यह मामला केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं, बल्कि बड़े आर्थिक घोटाले की ओर इशारा करता है।

 नियम बनाम हकीकत

खनन के स्पष्ट दिशा-निर्देश और सीमाएं तय हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। सवाल उठता है कि क्या नियम सिर्फ कागजों तक सीमित रह गए हैं?

 जिम्मेदार कौन?

खनन विभाग, स्थानीय प्रशासन और ठेकेदार—तीनों की भूमिका संदेह के घेरे में है।

  • अगर अनुमति दी गई थी, तो नियमों का पालन क्यों नहीं हुआ?
  • और अगर अनुमति नहीं थी, तो यह अवैध खनन किसकी संरक्षण में हो रहा है?

पर्यावरण पर खतरा

डेंजर ज़ोन में खनन से नदी के प्रवाह में बदलाव, तटों के कटाव और आसपास के गांवों के अस्तित्व पर खतरा बढ़ गया है। यह केवल आर्थिक अनियमितता नहीं, बल्कि गंभीर पर्यावरणीय संकट भी है।

जनप्रतिनिधियों की प्रतिक्रिया

मामले को लेकर जनप्रतिनिधियों ने भी आवाज उठाई है और इसे संसद, विशेषकर लोकसभा तक ले जाने की बात कही है। इससे साफ है कि मामला अब राष्ट्रीय स्तर पर भी गूंज सकता है।

पारदर्शिता की कमी

खनन स्थलों पर न तो स्पष्ट सूचना बोर्ड हैं और न ही सीमांकन या निगरानी की व्यवस्था है। ऐसे में पारदर्शिता का अभाव भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है।