भारत के मशहूर फोटो जर्नलिस्ट रघु राय का रविवार को निधन हो गया। लगभग पांच दशकों तक उन्होंने अपने कैमरे से देश और दुनिया की ऐसी तस्वीरें कैद कीं, जो सिर्फ खबर नहीं रहीं, बल्कि इतिहास का हिस्सा बन गईं। India news today में यह खबर सिर्फ एक व्यक्ति के जाने की नहीं, बल्कि एक पूरे दौर के समाप्त होने की तरह देखी जा रही है।
साफ शब्दों में कहें तो रघु राय ने photojournalism को सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि समाज को समझने और दिखाने का एक जिम्मेदार माध्यम बनाया। उनकी तस्वीरें आज भी Google News और Today news के संदर्भ में बार-बार सामने आती हैं, क्योंकि उनमें समय को रोक देने की ताकत है।
‘Burial of an Unknown Child’: एक तस्वीर जिसने दुनिया को झकझोर दिया
1984 की Bhopal Gas tragedy को दुनिया के सबसे भयानक औद्योगिक हादसों में गिना जाता है। इस त्रासदी के बाद रघु राय की एक ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर—‘Burial of an Unknown Child’—ने पूरी दुनिया को हिला दिया।
इस तस्वीर में एक पिता अपने मृत बच्चे को गोद में लिए हुए दिखता है। यह सिर्फ एक फोटो नहीं थी, बल्कि उस दर्द, बेबसी और त्रासदी की गहराई को सामने लाने वाला दस्तावेज बन गई। यही वह काम था, जिसने रघु राय को photo history में अमर बना दिया।
फोटोग्राफी का उनका नजरिया: इतिहास को स्थायी बनाना
रघु राय का मानना था कि तस्वीरें सिर्फ सुंदरता के लिए नहीं, बल्कि इतिहास को दर्ज करने के लिए होती हैं। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि लिखित इतिहास बदला जा सकता है, लेकिन तस्वीरों का इतिहास नहीं बदला जा सकता।
उनकी सोच स्पष्ट थी फोटोग्राफी का उद्देश्य समाज को छूना और सच्चाई को सामने लाना होना चाहिए। यही वजह है कि उनके काम में दिखावा नहीं, बल्कि गहराई और सच्चाई नजर आती है।
शुरुआत से अंतरराष्ट्रीय पहचान तक का सफर
1942 में जन्मे रघु राय का फोटोग्राफी में आना एक संयोग था, लेकिन उनकी प्रतिभा ने उन्हें बहुत जल्दी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिला दी। 1972 में पेरिस में उनकी पहली प्रदर्शनी लगी, जिसमें भारत और Bangladesh War से जुड़ी तस्वीरें शामिल थीं।
उनकी इस प्रदर्शनी ने फ्रांसीसी फोटोग्राफर Henri Cartier-Bresson का ध्यान खींचा, जिन्होंने 1977 में उन्हें Magnum Photos के लिए नामांकित किया। यह किसी भी फोटोग्राफर के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।
कैमरे के पीछे का दर्शन: करीब जाना, सच को महसूस करना
रघु राय का मानना था कि अगर आप अपने विषय के करीब नहीं जाते, तो तस्वीर प्रभावशाली नहीं बनती। उनके लिए फोटोग्राफी सिर्फ एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि एक अनुभव था।
उन्होंने कहा था कि जब आपकी ऊर्जा पूरी तरह केंद्रित होती है, तब आपका मन, शरीर और आत्मा एक लय में आ जाते हैं, और आप अपने सामने की सच्चाई को बेहतर तरीके से महसूस कर पाते हैं।
एनालॉग से डिजिटल तक: बदलते दौर पर उनकी सोच
रघु राय ने अपने करियर की शुरुआत एनालॉग दौर में की थी, जब तस्वीरों की उम्र और गुणवत्ता को बहुत महत्व दिया जाता था। उन्होंने silver gelatin prints की तारीफ करते हुए कहा था कि उनकी उम्र 150 साल या उससे भी ज्यादा होती है।
हालांकि बाद में उन्होंने डिजिटल फोटोग्राफी के साथ भी काम किया, लेकिन वे इस बात को लेकर चिंतित थे कि आधुनिक दौर में फोटोग्राफी का स्तर और उद्देश्य बदल गया है।
आधुनिक फोटोग्राफी पर आलोचना
रघु राय ने आज के दौर की फोटोग्राफी पर भी खुलकर अपनी राय रखी। उनका मानना था कि आजकल ज्यादातर तस्वीरें सिर्फ दिखावे और सोशल मीडिया के लिए बनाई जा रही हैं।
उन्होंने कहा था कि सेल्फी और सतही तस्वीरों का चलन बढ़ गया है, जिससे फोटोग्राफी की गहराई कम होती जा रही है। उनके अनुसार, एक गंभीर फोटोग्राफर को समाज को प्रभावित करने वाली तस्वीरें बनानी चाहिए।
सामाजिक और राजनीतिक घटनाओं की गहरी पकड़
रघु राय ने अपने करियर में कई बड़े ऐतिहासिक क्षणों को कैमरे में कैद किया। Bangladesh War, इंदिरा गांधी के चित्र, मदर टेरेसा के जीवन के पल, और भारत की सड़कों का आम जीवन—इन सबको उन्होंने अपनी नजर से दिखाया।
उन्होंने The Statesman जैसे प्रतिष्ठित अखबार के साथ भी काम किया और हमेशा इस बात का ध्यान रखा कि उनकी तस्वीरें खबरों से आगे जाकर लंबे समय तक जीवित रहें।
अंतिम समय तक सक्रियता: उम्र नहीं बनी बाधा
अपने जीवन के आखिरी वर्षों में भी रघु राय सक्रिय रहे। कोविड-19 महामारी के दौरान भी उन्होंने बाहर निकलकर CAA protests और किसान आंदोलन की तस्वीरें खींचीं। यह उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है कि फोटोग्राफी उनके लिए सिर्फ काम नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा थी।










