देवरिया। हिंदू धर्मग्रंथों और व्रत कथाओं में “सूत जी” का नाम अत्यंत श्रद्धा के साथ लिया जाता है। उनका वास्तविक नाम रोमहर्षण था, जिन्हें पुराणों का सबसे महान वक्ता माना जाता है।

Romharshan का जन्म एक विशिष्ट परिस्थितियों में हुआ था। उनकी माता ब्राह्मणी और पिता क्षत्रिय थे, जिसके कारण उन्हें “सूत” कहा गया। एक अन्य कथा के अनुसार उनका जन्म यज्ञ की अग्नि से हुआ, जिसमें देवगुरु बृहस्पति और देवराज इंद्र के तत्व सम्मिलित थे।

उन्होंने महर्षि Ved Vyasa को अपना गुरु बनाया और उनकी शरण में रहकर 18 महापुराणों का गहन अध्ययन किया। अपनी असाधारण स्मरण शक्ति और प्रतिभा के बल पर उन्होंने सभी पुराणों को कंठस्थ कर लिया।

ब्रह्मा जी के निर्देश पर रोमहर्षण ने नैमिषारण्य में अपना आश्रम स्थापित किया, जहां वे प्रतिदिन सत्संग के माध्यम से ज्ञान का प्रसार करने लगे। उनकी कथा शैली इतनी प्रभावशाली थी कि न केवल मनुष्य, बल्कि पशु-पक्षी भी उसे सुनने के लिए आकर्षित होते थे।

नैमिषारण्य में ही उन्हें “सूत जी” के रूप में प्रसिद्धि मिली। उनके पुत्र Ugrashrava ने भी अपने पिता की परंपरा को आगे बढ़ाया और पुराणों के ज्ञान का प्रचार किया।

एक प्रसंग में भगवान Balarama के क्रोधवश सूत जी का वध हो गया, जिसके बाद उनके पुत्र उग्रश्रवा ने शेष पुराणों की कथा को पूर्ण किया।

सूत जी का जीवन हमें यह सिखाता है कि ज्ञान, भक्ति और कर्म के माध्यम से कोई भी व्यक्ति महान बन सकता है। उनका योगदान हिंदू धर्म और संस्कृति में अमूल्य है।